– ग़ज़ल –
शाखे गुल है कि ये तलवार खिंची है यारो
बाग़ में कैसी हवा आज चली है यारो
कौन है खौफ़ज़दा जश्ने सहर से पूछो
रात की नब्ज तो अब छूट चली है यारो
ताक के दिल से दिले शीशा–ओ पैमाना तक
एक एक बूँद में सौ शम्मा जी है यारो
चूम लेना लबे लाली का है रिन्दों को रवा
रस्म ये बादये गुल गूँ से चली है यारो
सिर्फ एक गुन्चा से शर्मिन्दा है आलम की बहार
दिले खूँ गश्ता के होटों पे हँसी है यारो
वो जो अंगूर के खोशों में थी मानिन्दे नोजूम
ढल के अब जाम में खुरशीद बनीं है यारो
बू ए खूँ आती है मिलता है बहारों का सुराग़
जाने किस शोख सितमगर की गली है यारो
ये ज़मीं जिससे है हम खाक नशीनों का ओरूज
ये जमीं चाँद सितारों में घिरी है यारो
जुर्रए तल्ख भी है जाम गवारा भी है
जिन्दगी जश्न गहे बादा कशी है यारो
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