– ग़ज़ल –
ये राज़ है मेरी ज़िन्दगी का
पहने हुए हूँ कह़न खुदी का
फिर नश्तरे ग़म से छेदते हैं
एक तर्ज है ये भी दिलदही का
ओ लफृजो बयाँ में छुपाने वाले
अब क़स्द है और खामोशी का
मरना तो है इब्तदा की एक बात
जीना है कमाल मुन्तही का
हैं सीना गुलों की तरह कर चाक
दे मर के सबूत ज़िन्दगी का
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