ग़ज़ल

न रो ऐ दिल कहीं रोने से तक़दीरें बदलती हैं
ज़ियाए रंगो रोग़न से ये तस्वीरें बदलती हैं

तुम्हीं ने प्यार बखशा था तुम्हीं ने फेर ली आँखें
बहर सूरत मेरे ख्वाबों की ताबीरें बदलती हैं

असर अन्दाज़ तो ऐ गर्दिशे अइयाम क्या होगी
कहीं तदबीर से क़िस्मत की तहरीरें बदलती हैं

न पूछो अहले गुलशन से कि आकर सेहने गुलशन में
बदल जाते हैं दीवाने कि ज़नजीरें बदलती हैं

मुहब्बत में एक ऐसा वक़्त भी आता है ऐ सफ़वी
कि अज़खुद नारसा आहों की तासीरें बदलती हैं

(31 दिसम्बर 1959)

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