ग़ज़ल

शिकवए तन्ज़ीमे गुलशन क्या करें
गुल्सिताँ वालों से अनबन क्या करें

हमको दुनिया छोड़ने का ग़म नहीं
छुट रहा है तेरा दामन क्या करें

ज़ुल्फे शब गों के तसव्वर से भी अब
बढ़ रही है दिल की उलझन क्या करें

या एलाही खातमा बिलखैर हो
जी के अब दुनिया को बदज़न क्या करें

शौक है मन्जि़ल का ऐ सफ़वी मगर
राहबर भी अब है रहज़न क्या करें

(02-01-1959)
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