– ग़ज़ल –
सैयाद भी चमन में है और बाग़बाँ भी आज
फिकरे बहार भी है ग़मे आशियाँ भी आज
सहबाए लुत्फ दोस्त से सरशार थे जो कल
दामन कुशाँ है उनसे मए अरग़वाँ भी आज
उफ तेरी सादगी की ये रानाई तमाम
हैं शर्मसार तुझसे महो कहकशाँ भी आज
शरहे जमाले यार किसी से न हो सकी
जुम्बिश आ के रह गये कौनो मकाँ भी आज
सफवी ये इन्क़लाबे ज़माना का है असर
मुँह फेरते हैं मुझसे मेरे मेह्रबाँ भी आज
(नवम्बर 1960)
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