– नात शरीफ़ –
निगाह हक़ से वाबस्ता है मैखाना मुहम्मद का
जो दीवाना खुदा का है वो दीवाना मुहम्मद का
जिसे जन्नत से तश्बीह देना ग़ैर मुमकिन है
मदीने की हैं वो गलियाँ वो काशाना मुहम्मद का
रहे गा हश्र तक वो बेनेयाज़ कौसरो–ज़मज़म
अज़ल से पी के आया है जो पैमाना मुहम्मद का
जिसे देखा वो बीमारे मुहब्बत हो गया उनका
बेहम्दुल्लाह अन्दाज़े तैबाना मुहम्मद का
फ़क़ीरों को भी मिलती है शहिन्शाही यहाँ सफ़वी
ये वो दरबार है दरबारे शाहाना मुहम्मद का
(मौरखा 19 दिसम्बर 1958)
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