– नज्म –
हिन्द में सब हो गये हैं अब तअस्सुब के शिकार
दामने जमहूर गुलशन हो गया है तार तार
आज भारत के मुसलमाँ का न पूछो हाल ज़ार
हैं बड़े मजबूरो–बेकस कसमपुर्सी के शिकार
मरहबा तनहाई मेरी आज रौशन हो गई
सुब्ह का पैग़ाम लेकर आई शामे इन्तज़ार
क़ौमी एकजेहती का नारा किस तरह हो कामयाब
बह रहा है जबकि चारों सिम्त बहरे इन्तशार
क़ौम से इतना ही मतलब रहबराने क़ौम को
चाहते हैं गुल्सिताँ पर अपना अपना एक़तेदार
जिस्म का साया भी मुझको अजनबी दिखलाई दे
राज़ी रोटी छ्िन गई है छ्िन गया है रोज़गार
कौन है जिसने मेरी सारी मसर्रत छीन ली
कौन है जो दिल को रखता है हमेशा बेक़रार
जिन्दगी के बाग़ में क्या मुस्कराएं गे गुलाब
पाँव से लिपटी है मेरे गर्दिशे लैलो नहार
मैं तेरा बन्दा हूँ मुझ पर रहम कर परवर दिगार
अपने अनवर को न करना हश्र में रुसवा व ख्वार
–––