– आहंग –

न आँख लग सकी अपनी न आज ग़म रोया

फ़ेज़एं भीग गईं चाँद इस क़दर रोया

अवध की शाम का अफसाना याद आता है

दयारे शौक़ का वीराना याद आता है

मजाज़ नाम का दीवाना याद आता है

कि आज सूरते-शहनाज़ व लालारुख तनहा

किस की याद में आहंग पढ़ रही हो तुम

तुम्हें भी आज ग़मे दिल ने दश्ते वहशत में

बुला लिया है कि चाहत किसी की याद करो

वो मैकदे में गया क्यों यहाँ न क्यों आया

तुम आज वहशतो-हसरत किसी की याद करो

ओफ़क़ की ओट से वह भी ये देखता होगा

कि उसके बाद शबिस्ताँ पे क्या गुज़रती है

क़दम क़दम दिले-याराँ पे क्या गुज़रती है

जमाले-शह्रे-निगाराँ पे क्या गुज़रती है

इरादा है कि चमन के शगुफ़्ता फूलों में

अगर मुझे भी बहारों ने वहशतें बख़्शीं

फलक के चाँद सितारों ने वहशतें बख़्शीं

तो मैं भी फेर के हँसते हुए गुलों से नज़र

जो हो सका तो कोई रंग छोड़ जाऊँगा

तुम्हारे वास्ते ’’आहंग’’ छोड़ जाऊँगा

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1966