ग़ज़ल

दोस्तो ठीक है हर गाम पे अब जंग करो
है इसी में बड़ा आराम हमें तंग करो

मोम के जिस्म बुलाते हैं जलाने के लिये
तुम भी पत्थराए हुए हो तो मेरा संग करो

अपनी सूरत मेरी सूरत में न पाओगे अभी
और कुछ रोज़ तमन्नाए गुलो-रंग करो

ख़ाक को ख़ाक में मिल जाने दो फ़ुरक़त कबतक
रूह को रूह से ऐ दोस्त हम आहंग करो

ज़ह्र भी साथ न देगा अगर आँसू टपके
इस घड़ी मत मरी आँखों को लहू रंग करो

ऐसे अल्फ़ाज़ तराशो जो नये हों राही
अपने दीवान से पैदा नये फरहंग करो

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1971