गीत

गाँव से शहर तक लोग फैले
पन्थ मजहब की दूकान लेके
कोई गीता का उपदेश लेकर
कोई हाथों में कुरआन लेके
गाँव से शहर तक —–

ढेरों हिन्दू मुसलमाँ मिले हैं
एक इन्सान का रूप ढाले
एक इन्सान मैं ढूँढता हूँ
कुछ मनुजता की पहचान लेके
गाँव से शहर तक —–

जितना ज्यादा दवा की गई
रोग उतना ही बढ़ता गया
सबके सब राय देने लगे
अपने खेमे का विद्वान लेके
गाँव से शहर तक —–

सच को लिखने से कतरा गई लेखनी
जिस कलम ने लिखा वह कलम हो गई
फूल खुशबू पे कविताएं लिखकर
बैठे हैं कवि की पहचान लेके
गाँव से शहर तक —–

मैं ये कहता नहीं कि विषय छोड़ दो
किन्तु कुछ तो लिखो बिगड़े परिवेश पे
वक्त के एक तुम्हीं ही कलमकार हो
बैठे हो क्यों कलमदान लेके
गाँव से शहर तक —–

जल रहा रोम नीरो न बन्सी बजा
बन्सी वाले ने ही चक्र दौड़ाया था
कितने पल जी सकोगे बताओ
बेवजह का ये अपमान लेके
गाँव से शहर तक —–

तस्करी हो रही जग में इन्सान की
सरफिरों ने घुमाए हैं सर इस तरह
गर्व से घमते हैं चमन में
आदमीयत का उनवान लेके
गाँव से शहर तक —–

जाति मजहब औ पंथाई झगड़े
इनसे ऊपर उठो तो बतायें
शहरों शहरों तुम्हें ढूँढते हैं
नूर फेराक रसखान लेके
गाँव से शहर तक —–

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