– गीत –
बहुरे दिन चैतू चमार के
हर पल सिंगार के
बहुरे दिन —–
खड़ी दोपहरी में पाँवों की चटपट
माथे पे घानी के तेलों की करवट
तरकुल की खोर धरे टयराही चट्टी
खोल रही तन्त्री की हर पोल पट्टी
गुरखुल से पाँव छतनार के
बहुरे दिन —–
झोरे की गुरधनिया नैहर से सासुर
टहल घूम चींटी गपकती थी पाहुर
कांधे कमीज रही यात्रा की सहचर
केवल सिवाने पे चढ़ती थी तनकर
नखरे दिखाती थी हाथी सवार के
बहुरे दिन —–
चार दिन चन्दा चन्दनियाँ के सपने
छोड़ दिये झूठे सुख मूल रण अपने
अपने ही जीवन में सुख की परछाईं
छूने की आस चढ़ी छोड़ी लड़ाई
कर दिये हस्ताक्षर सुधार के
बहुरे दिन —–
आधी अधूरी आजादी के टोटके
लील गई पोथी गुलामी के झटके
बीत गये रीत गये आये दिन अच्छे
अब न रिरियाएंगे ये मेरे बच्चे
दादी की आँख दिखे सपने उधार के
बहुरे दिन —–
––