– ग़ज़ल –
जश्ने आज़ादी मनाई जा रही है
अम्न की बंसी बजाई जा रही है
भाषणों में हैं भगतसिंह आज भी
फस्ल जयचन्दी उगाई जा रही है
हर तरफ इन्साफ के मुन्सिफ हैं पर
बे ख़ता फाँसी सुनाई जा रही है
जल समस्या पर बहस हाथों में रम
काग़ज़ी गंगा बहाई जा रही है
एक टूटी ही नहीं कि दूसरी
पाँव की बेड़ी बनाई जा रही है
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