ग़ज़ल

किसी जानिब क़लम उट्ठे कोई मौजू नहीं देते
लहरते बेहया के फूल हैं खुशबू नहीं देते

तिजोरी भर के रखते हैं सदा अपनों की खातिर ये
ग़रीबी दूर हो जिससे वही साहू नहीं देते

हमारी बात पर विश्वास ना हो आजमा लेना
यहाँ शैतान सब देता है जो साधू नहीं देते

अलग है प्यार करने का तरीका आज भी अपना
खुशी देते हैं हम जिसको उसे आँसू नहीं देते

हम ऐसे ज्योतिषी हैं काट देते ग्रह दशाओं को
किसी की ज़िन्दगी में राहु वो केतू नहीं देते

––