कविता

सोच सको तो सोचो
साम्प्रदायिकता के फैलते हुए जहर पर
आतंकवाद के बढ़ते हुए कहर पर
जातिवाद की ऊँची उठती हुई लहर पर
और प्रदूषण से युक्त अपने शहर पर
सोच सको तो सोचो
दहेज की आग में जलती हुई बेटियों पर
पसीने से भीगी हुई गरीब की रोटियों पर
शोषण करने वालों की गगनचुम्बी कोठियों पर
और उसी के बगल में दुर्गन्ध युक्त बस्तियों पर
सोच सको तो सोचो
भूख से तिलमिलाती हुई तरुणाई पर
सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती हुई मँहगाई पर
हिन्दू मुसलमान सिक्ख ईसाई पर
और उनके बीच बढ़ती हुई नफरत की खाई पर
सोच सको तो सोचो
गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए इन्सान पर
सिर्फ पैसों के लिये बिकते हुए ईमान पर
वर्तमान दौर के परमाणविक अनुसन्धान पर
और इन्हीं सबके बीच अपने प्यारे हिन्दुस्तान पर
सोच सको तो सोचो
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