– ग़ज़ल –
जाने कि कैसे सपने सजाने लगे हैं लोग
फूलों की जगह शूल ही बोने लगे हैं लोग
आज अपना वो गौरवमयी इतिहास भूलकर
पाश्चात्य सभ्यता में गुम होने लगे हैं लोग
मतलब परस्त लोगों की हिम्मत तो देखिये
लाकर किनारे नाव डुबोने लगे हैं लोग
अपने ही हाथों अपना अस्तित्व बेच कर
दिल रो रहा चेहरे से खुश होने लगे हैं लोग
जबरन जला के अपनी बहुओं को आज कल
घड़ियाली रुलाई यहाँ रोने लगे हैं लोग
सदभाव शान्ति सत्य अहिंसा को छोड़ कर
बालेदीन अपने खूँ से भिगोने लगे हैं लोग
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