– गीत –
देवि वर दे बढ़ सकूँ मैं श्रीचरण में स्थान पाऊँ
देवि वर दे —–
देखता हूँ अमल अनुपम भाव का गुम्फन सुहाना
पा सुरभिमय सुमन डाली समुदमातः मुस्कुराना
आ गया हूँ द्वार तक पर शिथिल हूँ क्या लौट जाऊँ
देवि वर दे —–
लख प्रवाहित धार रस की शुष्क मानस तिलमिलाता
अर्चना के सुमन धूमिल पग स्वयं ही ठमक जाता
रुक विवशते उग्र मत हो भगवती से पूछ आऊँ
देवि वर दे —–
देवि बेमांगी दया से किसी को कवि गुरु बनाया
सुन विरुद् तेरा पुजारी दूर से कुछ फूल लाया
जा करे स्वीकार तो मैं भी सफल जीवन बनाऊँ
देवि वर दे —–
–––