गीत 

पीर उर की कण्ठ में आ राग कैसे बन गई है
पीर उर की कण्ठ में —–

यह वहीं राकेश विरहिन ताप जो बढ़ कर बढ़ाता
सिन्धु क्यों इसके चरण पर झूम श्रद्धान्जलि चढ़ाता
आह इसकी शीतता अनुराग कैसे बन गई है
पीर उर की कण्ठ में —–

प्रिय वियोग विदग्ध रंगिनि आत्म विस्मृति ढो रही है
पीर को उर में समेटे आज सन्ध्या सो रही है
वेदना इसकी अखण्ड सुहाग कैसे बन गई है
पीर उर की कण्ठ में —–

वही जो मानव हृदय में चिर पिपासा बीज बोए
तृप्ति की आशा लिये तड़पन अपरिमित जो संजोये
रागिनी करुणा प्रपूरित फाग कैसे बन गई है
पीर उर की कण्ठ में —–

ठोकरें खा कर जगत की प्यार जिसका पल न पाया
जो कि झंझा में गिरा पर दीनहीन संभल न पाया
वह पलायन वृत्ति बोल विराग कैसे बन गई है
पीर उर की कण्ठ में —–

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