– कविता –
मानव मानव भेद जो करता वह न पाता कभी भी कल है
प्रेम अहिन्सा भाई चारा एकजेहती का रूप विमल है
देश के हित में सर जो कटाते राष्ट्र प्रेम वह महा प्रबल है
प्यासे मन को तृप्ति जो कर दे वह ही उसका गंगाजल है
पर दुख से द्रवित जो हृदय करुणा की वह मूर्ति सकल है
धैर्य व साहस जिसमें होता उसके हर संकट का हल है
कर्तव्य के पथ पर सदा जो चलता वह मानव बढ़ता प्रतिपल है
उसी वृक्ष की पूजा होती जो कि देता मीठा फल है
घटा जो छा के भू पर बरसे समझो कि वह ही बादल है
सदा समय से काम जो करता वह खुश रहता हर एक पल है
उसी का जीवन बना सार्थक जिसके बांहों में निज बल है
भाग्य सहारे जो भी रहता हर कामों में रहा विफल है
दो दिल धड़कन एक जो कर दे सफ़र वो समझो एक गजल है
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