– गीत –
चर्चा चारों ओर है फैली राजनीति दुखदायी है
जन नायक के बदन से निकली बेशर्मी बेहयायी है
चर्चा चारों ओर है फैली —–
वातानुकूल कमरे में बैठा नेता मौज उड़ाता है
सीमा का प्रहरी सरहद पर शान में जान गँवाता है
खून पसीने की उपजाई कृषक की सस्ती कमाई है
चर्चा चारों ओर है फैली —–
हत्या दंगा चोरी चकैती सबका सृजनहार है
हवस में अन्धा गोरख धन्धा पाप का पालनहार है
दया धर्म की बातें करता मन मनहूस कसाई है
चर्चा चारों ओर है फैली —–
अन्न का मेरे दाम लगाता जैसे खेत उसी का है
वेतन है हर साल बढ़ाता जैसे देश उसी का है
कहता बजट में घाटा आया इसीलिये मँहगाई है
चर्चा चारों ओर है फैली —–
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