ग़ज़ल

प्यार के नाम पर कुछ किया कीजिये
दुश्मनों से भी खुल के मिला कीजिये

मन से तम को मिटा दें सदा के लिये
प्यार की जोत बन कर जला कीजिये

चाँद कब तक घटाओं में छुपता रहे
चाँद पर आवरण मत किया कीजिये

है फ़िज़ा में घुला नफ़रतों का ज़हर
बनके खुशबू हवा में बहा कीजिये

वो तिमिर हो कि कोई भी परिवेश हो
फूल सा कंटकों में खिला कीजिये

इश्क़ में सर भी कट जाये क्या ग़म मधुर
राहे उल्फत में हर पल बढ़ा कीजिये

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