( मैंने देखा )

मैंने देखा!
जब शीत भी दुबककर रजाई
ओढ़े हुए थी
और धूप बैठकर आग ताप
रही थी
फटे और मटमैले कपड़े में लिपटी
उस नन्ही सी काया को
जो, सड़क के किनारे पड़े
कचरे के ढेर में
अपनी किस्मत खोज रहा था
करीब आठ वर्ष का बालक
जबान से तो चुप था
मैं आखों से बोल रहा था
उसमें बच्चों जैसी
चंचलता कहाँ थी
बचपन में बचपन खोकर
जीवन को खोज रहा था
कभी ऊँची अट्टालिकाओं को
देखता
तो कभीं कचरा उठाता
एक नजर उसने मेरी तरफ भी देखा
फिर अपने काम में लग गया
पता नहीं,
ये नफरत की नजर थी
या दर्द भरी
पर मैं,
अबतक नहीं भूली
वो चेहरा निश्च्छल मौन
ये सोच रही हूँ अब भी
आखिर दोषी कौन ?
आखिर दोषी कौन ?

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