सृजन करता जा रहा हूँ

सृजन करता जा रहा हू
सृजन करता जा रहा हूँ।
देखता हूँ टूट करके बिखरता है हर खिलौना,
फिर भी किसके वास्ते
सजता-संवरता जा रहा हूँ ?
सृजन करता………………।

एक अन्जाने मुसाफिर की तरह
कुछ गीत लिखकर
एक चैराहे से आकर दूसरे पर रूक गया हूँ।
पूछते हैं जब सभी परिचय हमारा पास आकर,
तब बताता हूँ कि मैं कल था नया,
अब भी नया हूँ।
क्या बताऊँ और जब इस जि़न्दगी के रास्ते पर
एक क्षण बनता हूँ
अगले क्षण
बिखरता जा रहा हूँ।
सृजन करता……………..।

एक पखवारा अन्धेरों से लिपट कर
हमने देखा चाँद काला हो गया है।
बुझ रहा है रोज सूरज राख बनकर
पवन वीरानों में जाकर सो गया है।।
जब प्रलय प्रतिबिम्ब आँसू में उभरते जा रहे हैं
सोचता हूँ फिर भी मैं क्यों आह भरता जा रहा हूँ
सृजन करता…………………।

दुध मुँहे संगीत, यौवन छू न जाये
गगन की दीवार बोझिल हिल रही है।
पीस कर मुट्ठी में मेंहदी का कलेजा
रोज सूरज को चुनौती मिल रही है।।
खाँसती है उम्र जब करवट बदलकर काल हँसता
सोचता हूँ पग बढ़ाकर क्यों ठहरता जा रहा हूँ ?
सृजन करता…………………..।