मुक्तक (कतात)

(1)   सत्य पर आवरण नहीं होता
वक्त का आचरण नहीं होता
आसुओं ने बताया आॅखों को
दर्द का व्याकरण नहीं होता।

(2)   फिर मुझे याद कर रहा कोई
वक्त बरबाद कर रहा कोई
अपनी परिभाषा देके लौटा है
मेरा अनुवाद कर रहा कोई।

(3)   खुद से अनबन सी हो गयी मेरी
सास दुश्मन सी हो गयी मेरी
बर्फ की आग में जला जबसे
देह कुन्दन सी हो गयी मेरी।

(4)   अपनी पहचान लेके भेज दिया,
हाथ में जान लेके भेज दिया।
भूख ने मुझको साॅप के घर में,
बीन की तान लेके भेज दिया।

(5)   मुस्कुराये कभी मलीन हुए
बहते पानी के आबगीन हुए।
जिन्दगी बन के तमाशा गुजरी,
और हम खुद तमाशबीन हुए।

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