– ग़ज़ल –

कोई भी मसला हो उसका हल निकलता है
रात कितनी स्याह हो सूरज निकलता है।

चंद दिन भी दुश्मनी ढंग से निभा पाए नहीं
ये सियासत है यहाँ सब कुछ बदलता है।

क़त्ल होगा आज सब छज्जों पे आ गए
क़ातिलो पर एक भी पत्थर न चलता है।

बेबशी का हाल विधवा माँ से जाके पूछिये
जिसका बच्चा बाप की खातिर मचलता है।

आज भी गुड़िया न ले पाई थी जिस मजबूर ने
अपने घर जाने में वो कितना दहलता है।

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