– गजल –

बचा है एक ही पत्ता बहार लाने को
बड़ी बेताब है आँधी उसे गिराने को

हटाके राह से पत्थर लहूलुहान हूँ मैं
मगर है फिक्र मिले रास्ता जमाने को

चली भी आए है मंजिल मेरे दरीचे पे
मेरी खुद्दारियॉ जिद पे हैं आजमाने को

उतर के सीढियॉं गिनती रही पहाड़ों को
मिला न वक्त समन्दर से कुछ बताने को

वे बादलों से बहारों की बात करते हैं
मैं परेशान झुलसती फसल दिखाने को

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