– ग़ज़ल –

व्यथाओं से लेकर विकल लिख रही हूँ
मैं जीवन के बदले गजल लिख रही हूं

सुना है जमीं आसमॉ है सभी का
इसी हक पे करके अमल लिख रही हूं

समंदर में सरिता समाती  है हरदम
ठहर के मैं खिलते कमल लिख रही हूं

हवाओं का रुख मोड़ते हो सुना है
मैं हूं साथ उसकी पहल लिख रही हूं

बचालूं मैं शिव जैसे सबको गरल से
यही सोचकर दरअसल लिख रही हूँ

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