– ग़ज़ल –
हो गया जो दिल दिवाना क्या करुँगी
बिन तेरे मौसम सुहाना क्या करुँगी
जब इशारों में ही बातें हो गई हैं
पढ़ के अब रंगीं फसाना क्या करुँगी
अनगिनत सपने सजाये बांकपन ने
अब अगर रूठे ज़माना क्या करुँगी
तू अगर माने न माने याद है सब
वो तेरा आँखें चुराना क्या करुँगी
खुद पे मुझको है भरोसा देख लेना
धड़कनों के साथ गाना क्या करुँगी
पूछती हैं ये बहारें ये फेज़ाएं
थक गई करके बहाना क्या करुँगी
आस्था की लेखनी सर चढ़ के बोले
झूट की ताली बजाना क्या करुँगी
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