
––– ग़ज़ल –––
न राज़दार है कोई न हमसफर मेरा
मिरा जनूँ है मुहब्बत में राहबर मेरा
समझ में आता नहीं जाऊँ तो किधर जाउँ
नहीं है कूचए महबूब में गुज़र मेरा
तेरी तलाश तेरी जुस्तजू के सेहरा में
भटक रहा है अभी दिल इधर उधर मेरा
तेरा जमाल ही रहता है सामने हरदम
ख़याल पहुँचे गा हरगिज़ न चाँद पर मेरा
जो अक़्लो होश के पैकर हैं वो समझते हैं
कलाम होता है क्यों इतना मुख़्तसर मेरा
हवाएँ चलने लगीं नफ़रतों की चारों तरफ़
लहू में डूबने वाला है क्या नगर मेरा
ʺबहार‘ जज़बए दिल काम कर गया शायद
बहुत उदास है वो हाल जान कर मेरा
– डा० बहार गोरखपुरी