– ग़ज़ल –

न कोई चेहरा न पत्थ्रर न आइना हूँ मैं
तेरी निगाह में आखिर बता कि क्या हूँ मैं

चलो यह माना कि कश्ती के नाखुदा तुम हो
बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं

कनारे आके सफ़ीने के साथ डूब गया
बड़ा गुरूर था कहता था नाखुदा हूँ मैं

यह सोचता हूँ तो दिल डूबने सा लगता है
कि रंगे खून तो एक है मगर जुदा हूँ मैं

तुम अच्छे लोगों को ढूँढो न ढूँढ पाओगे
हमेशा मैं ही मिलूँगा बहुत बुरा हूँ मैं

लगा लो सीने से या बेरुखी से बात करो
करो सोलूक जो चाहो अब आ गया हूँ मैं

यह जानकर कि वह बेगाना हो गया सालिक
न जाने क्यों उसे अपना ही कह रहा हूँ मैं

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