– ग़ज़ल –
वो सज़ा पाते हैं जिनकी है खता कोई नहीं
जानते तो सब हैं लेकिन बोलता कोई नहीं
काँधे से काँधा मिलाया दिल से दिल हाथों से हाथ
और उस पर यह कि अब मुझसे बुरा कोई नहीं
बस खुदा रक्खे तो रक्खे वरन् बहरे ग़म में हम
ऐसी कश्ती पर हैं जिसका नाखुदा कोई नहीं
वह किराये की हिफ़ाज़त में उन्हें खतरा ही क्या
पूछ्िये उनके कि जिनका आसरा कोई नहीं
जब वफ़ा का नाम लेना भी है अब जुर्मो खता
तुझसे अब शिकवा मुझे ऐ बेवफ़ा कोई नहीं
मौत आ कर उम्र भर की हमसफ़र अब हो गई
ज़िन्दगी अब तुझसे मेरा वास्ता कोई नहीं
कितने राही कितने सालिक और कितने राह रौ
ढँढें अपनी अपनी मन्जि़ल रास्ता कोई नहीं
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