जो सहारे थे हमारे वो बदलते जा रहे हैं
रह गये हैं हम अकेले लोग चलते जा रहे हैं
चुभ गया काँटा न जाने कब हमारे पाँव में
रास्ते मुश्किल मगर गिरते संभलते जा रहे हैं
रोज़ ही बढ़ने लगी है किस कदर दुश्वारियाँ
अपने बनकर हर घड़ी कुछ लोग छलते जा रहे हैं
था सिखाया उँगलियाँ थामे जिन्हें चलना कभी
आशियाने आज उन हाथों से जलते जा रहे हैं
मौसमी अंगड़ाइयों में धूप सूरज की लगे
मोम के पुतले बने थे वो पिघलते जा रहे हैं
दर्द दिल में सालता है बस यही माँ–बाप को
आस्तीनों में भला क्यों साँप पलते जा रहे हैं
टीस है मन में मधु दुनिया की फितरत देखकर
कौरवों की चाले से बचकर निकलते जा रहे हैं
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