– सरग से सुन्दर –

अमवा की डरिया प बोले कोइलिया
कगवा करेला कांव-कांव,
सरग से सुन्दर बा मोर गांव।

मुरगा जगावे रोज होत भोरहरिया,
सजि के किसान चलें खेतवा की ओरिया,
घुंघरू झनकि जाला बयला के गरवा
खाले ऊंचे धरे जब पांव,
सरग से सुन्दर बा मोर गांव।

पिपरा क पाती नांचे ठीक दुपहरिया,
चरर-मरर करे घन बंसवरिया,
नदी की कछरिया में झाड़ झंखडि़या में,
मोरवा नाचेला ठांव-ठांव,
सरग से सुन्दर बा मोर गांव।

गमके सीवान जब फूले सरसोइया,
गेहुंआं क बाली झूमे लहरे केरइया,
संझवा के बेला घरे अंगना के उपरा,
चिरई करेली चांव-चांव,
सरग से सुन्दर बा मोर गांव।

मन बउराला देखि चइत महिनवां,
सोनवां बिखरि जाला खेत खरिहनवां,
देखि के भुलाइ जाला जिनगी क पिरवा,
बालेदीन होइहें उभांव,
सरग से सुन्दर बा मोर गांव।