– ग़ज़ल –
आदमी बेकार होता जा रहा
राह का अख़बार होता जा रहा
नफ़रतें लायीं हैं परदेसी हवा
मतलबी संसार होता जा रहा
जल रहा इंसान अब इंसान से
जुल्म का अंगार होता जा रहा
झूठ पसरा है ज़हा में इस तरह
सच से ही इनकार होता जा रहा
कामनायें बढ रही है जीस्त में
फ़िक्र पर अधिकार होता जा रहा
देखता तक्सीम होते देश को
दूर अब घर बार होता जा रहा
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