– ग़ज़ल –
इन्तज़ारे सुब्ह से ऐसे में घबराएं गे क्या
रात के पिछले पहर साग़र छलक जाएं गे क्या
आंधियां भी जिन चिरागों को न ठन्डा कर सकीं
तेरे दामन की हवाओं से वह बुझ जाएं गे क्या
जो जेहादे ज़िन्दगी में खेलते हैं मौत से
वो तेरी तोपों से बन्दूक़ों से डर जाएं गे क्या
अहले ज़र देते हैं क्या क्या दावते रंगीं फ़रेब
उनकी साज़िश उनकी चालों में हम आ जाएं गे क्या
अम्ने आलम के लिये एक मुस्तक़िल खतरा हैं जो
झूठ है इन्सानियत पर वो तरस खाएं गे क्या
खुल गया दुनिया पे अब शेखो बरहमन का फ़रेब
वो धरम के नाम पर अब हमको कटवाएं गे क्या
अहले हक़ को धमकियां दारो रसन की हैं अबस
यूँ वो अज़मे आहनी से बाज़ आ जाएं गे क्या
आ रही है इस चमन में भी बहारे बेखेज़ाँ
ग़ुन्चे मुरझाएं गे क्या अब फूल कुम्हलाएं गे क्या
मुतमइन फ़रदा से हम हो जाएंगे क्या वाक़ई
सच बता जौहर वो दिन अब जल्द ही आएं गे क्या
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