ग़ज़ल

इस बरस बरसा न सावन खेत प्यासे रह गये
कल्पनाओं के सजाये ये घरौंदे ढह गये

लौट आए याचना के स्वर निठुर आकाश से
आस्था आहत हुई सपने सलोने ढह गये

रह गये प्यासे नदी नद नहर घट पनघट सभी
मलिन मन सूने नयन अन्तर व्यथा सब कह गये

श्याम घन ने पी कहाँ की टेर कर दी अनसुनी
प्रिय मिलन की आस के पल आँसुओं में बह गये

तप रही धरती तवा सी बने घर आँगन अवाँ
लहलहाते धान खेतों में झुलस कर रह गये

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