– ग़ज़ल –

उठता शोर संभालो यारों
घर का चोर संभालो यारों

लूट न लें रजनी से पहले
सुरभित भोर संभालो यारों

बे मौसम जो नाच रहा है
नकली मोर संभालो यारों

प्यास कुएँ से बुझ जायेगी
उलझी डोर संभालो यारों

इस सीमा से उस सीमा तक
कोई छोर संभालो यारों

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