– ग़ज़ल –
उदास झरना है टापू में गूँजता ही नहीं
हर तरफ जुल्म का कोहरा है सूझता ही नहीं
घरों में रहते हैं टूटे हुए बरतन की तरह
बड़े बुजुर्गों को अब कोई पूछता ही नहीं
मारे मारे यहाँ फिरते हैं इल्म के हीरे
अजीब दौर है कि कोई लूटता ही नहीं
निजीकरण की हवस वाली इस व्यवस्था में
सिलसिला अपना गुनाहों से टूटता ही नहीं
इसे मिटाने यहाँ सूरमा बहुत आये
मगर बुराई का सूरज है डूबता ही नहीं
––