एक हसीं ज़ोहरा जबीं फिर मुझको बहकाने लगी
इश्व वो अन्दाजो ग़मज़े मुझको दिखलाने लगी
दख्ल फिर देने लगी आकर मेरे हर काम में
फिर ख़लल अन्दाज़ होती है मेरे आराम में
फिर मुझे दिखला रही है फासले पर सब्ज़ बाग़
फिर जलाना चाहती है वो मोहब्बत का चिराग़
बे सबब फिर मेरे उपर मेह्रबां होने लगी
कांटे मेरी रहगुज़ारों में वो फिर बोने लगी
फिर वो आमादा हुई मुझको सताने के लिये
आग रौशन कर रही है फिर जलाने के लिये
डालती है हर तरफ से वो कमन्दे नाज़ फिर
मुझको दिखलाने लगी वो इश्व वो अन्दाज़ फिर
फिर मुझे करने लगी माएल गुनाहों की तरफ
मुझको ले जाती है फिर नापाक राहों की तरफ
दे रही है फिर मुझे वो दावते रंगीं फ़रेब
लूट लेने पर है आमादा वो मेरा सब्रो शकेब
क्या करूँ फिर कर लूँ मैं उस पर यकीनो एतबार
क्या करूँ फिर कर लूँ मैं अपने जिगर को बेक़रार
क्या करूँ फिर आग में मैं कूद जाउँ क्या करूँ
अपनी ही गरदन पे खुद ख़न्जर चलाउँ क्या करूँ
लाख वो कोशिश करे धोके में आ सकता नहीं
मैं किसी को भी शरीक अपना बना सकता नहीं
उससे और उसकी मोहब्बत से है अब नफ़रत मुझे
मेरे दिल में कोई अरमां है न कुछ हसरत मुझे
दूर रहना चाहता हूँ उस से घबराता हूँ मैं
अपनी तनहाई में लुत्फे ज़िन्दगी पाता हूँ मैं
चाहे जो हो जाए हर एक शै को जौहर छोड़ दूँ
ग़ैर मुमकिन है कि अपने अह्द को मैं तोड़ दूँ
–––