– कविता –
सत्य सत्य सब कोइ कहे,सत का मरम न जानइ
जय गोविन्द वहि सॉच जोइ सॉचै पहिचानइ
खोजन चले विदेस देस तजि तन मन आशा
सुत कलत्र धन धाम त्यागि जंगल में वासा
गुरु पीर बहु किया दिया सब मिलि उपदेशा
पूजा लेंहि बनाइ छुटे नहि नियत कलेशा
षट् दर्शन व्रत नेम तीर्थ जप जोग बतावहिं
झूठी बात बताय काठ पत्थर पुजवावहिं
कोइ मस्जिद कोइ गौर देवघरा माथ नवावहिं
धाय मरै पछतायं उहॉ कछु फल ना पावहिं
जय गोविन्द की बात तिनहि को लगिहैं प्यारी
जिन तन मन धन प्रान सकल निर्बल पर वारी
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