ग़ज़ल

कहें और क्या बस चलो दोस्तो
जहाँ भी रहो खुश रहो दोस्तो

ज़मीं पर अगर गिर पड़े आसमां
तो दरियाओं पर गिर पड़ो दोस्तो

किसी और से ये न सुन पाओगे
मैं जो कह रहा हूँ सुनो दोस्तो

ये चाँद और ये कहकशाँ क्या करुँ
किसी और को बख़्श दो दोस्तो

ख़ेजाँ ता ख़ेजाँ गर्द है ख़्वाब की
बहारों को आवाज़ दो दोस्तो

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1972