– ग़ज़ल –

किसी की याद मेरे दिल से जा नहीं सकती
मेरे चिराग़ को आँधी बुझा नहीं सकती

कुछ इस बला की कशिश है कि चश्मे नज्ज़ारा
जमाले यार से नज़रे चुरा नहीं सकती

नहीं यक़ीन तो टकरा के देख लें मौजें
हमारी कश्तिये दिल डगमगा नहीं सकती

संभाला है मेरे दिल ने जिसे मुहब्बत में
वो बारे ग़म कभी दुनिया उठा नहीं सकती

बला से क्यों न करें एतराफ़ उलफ़त का
मगर निगाहे मुहब्बत छुपा नहीं सकती

कमाल ऐसी मुहब्बत को दूर ही से सलाम
जो मेरा साथ शबे ग़म निभा नहीं सकती

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