– गीत –
गीत लिखता नहीं कल के अखबार पर
गिरती सरकार पर, सजते दरबार पर,
गीत लिखता नहीं …….
गीत का है विषय मेरे पीड़ित मनुज
स्वार्थों के लिये जिसको घेरे दनुज
लेखनी है अड़ी मुक्ति के द्वार पर
गीत लिखता नहीं …….
बन्दगी करते करते कमर झुक गई
कर्ज चुकता नहीं जिन्दगी चुक गई
फिक्र है आजकल घिरती दीवार पर
गीत लिखता नहीं …….
जाति भाषा में जो बाँटते आदमी
आज भी ऐसे जन की नहीं है कमी
फिरके फिरके में बँटते हुए प्यार पर
गीत लिखता नहीं …….
पूर्ण मुक्ति के रण जो खड़े एक क्षण
आज उनकी शरण बढ़ रहे हैं चरण
अब भरोसा नहीं छलते पतवार पर
गीत लिखता नहीं …….
गीत लिखता नहीं कल के अखबार पर
गिरती सरकार पर, सजते दरबार पर
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