कवि गीत लिखो, अपने पन का
श्रृंगार नहीं हो, हास्य नहीं
हो जननी का, उपहास नहीं
कभी ध्येय नहीं हो, हेय अपना
हम देखें सदा, मंगल सपना
कवि —– ।

उपकार में हो, सब कुछ अपना
उल्टी न कभी, माला जपना
हो वर्ण वर्ण में, ओज भरा
नव राग हिलोरे यौवन का
कवि —– ।

सत्कर्म पंथ, शुभ उज्जवल हो
स्वदेश प्रेम गीत अविरल हो
पुण्यार्थ चरण यह अविचल हो
पर पीर हरण, मन संबल सा
कवि —– ।

जो अन्धकार को चीर सके
तूफानी रोक, समीर सके
वह छन्द बन्द लिख रे टामन
बन जाये कौतुक जीवन का
कवि —– ।

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