जग मग ज्योति जलीं, धरा पर जग मग ज्योति जलीं
देखीं धरा पर अप्सराएं, बन ईर्ष्यालु जलीं
धरा पर जब जब ज्योति जलीं …..
पथ पथ मग मग गलियां गलियां, द्वारे द्वारे द्युति आवलियां
टिमटिमाती टोलियां उनकी जैसे अग्नि पुष्प की कलियां
प्रस्फुट प्रदीप्त बल्लरियों में भातीं भाँति भलीं
जग मग ज्योति जलीं, धरा पर जग मग ज्योति जलीं … (1)
नहीं सह सकीं धरती का यश द्रोहोद्वेग द्वेषेर्ष्यावश
युद्ध योजना भईं सुनिश्चित बनीं सहायक तमा अमावस
धरा विरुद्ध अप्सरास्पर्धा चाल कुचाल चलीं
जग मग ज्योति जलीं, धरा पर जग मग ज्योति जलीं … (2)
तिमिर तमा पति पत्नी दम्पति रही अमा जो उनकी सन्तति
तामस वृत्ति तमो गुण प्रेरित असुर वैचारिक मानसिक मति
क्षण क्षण में रण पण पण में रण खल की खली खलीं
जग मग ज्योति जलीं, धरा पर जग मग ज्योति जलीं … (3)
दुष्टों का रण युद्ध अकारण उग्र स्वरूप किया जो धारण
तमा अमा चन्द्रमा हरण कीं एकमात्र ईर्ष्या ही कारण
तिमिर–तमातमसासुर सेना बढ़ीं चढ़ीं मचलीं
जग मग ज्योति जलीं, धरा पर जग मग ज्योति जलीं … (4)
विनाश तत्व का बढ़ा महत्व धर्म सत्व का क्षीण अर्हत्व
भईं ऋद्धि–सिद्धि क्रुद्ध विरुद्ध उमा रमा का मरा मर्मत्व
शुद्धि बुद्धि विद्या सुपात्रता अवगुण रूप धरीं
जग मग ज्योति जलीं, धरा पर जग मग ज्योति जलीं … (5)
बढ़े उपद्रव में द्रव ही द्रव, द्रव मायावश किया उपद्रव
धरा विरोधी बढ़े धरा पर अधर्मवश लक्ष्मी दर्पद्रव
जनमानस की अनाचारिता सच्चर्या निगलीं
जग मग ज्योति जलीं, धरा पर जग मग ज्योति जलीं … (6)
विस्फोटक विध्वंशक अधर्म लक्ष्मी विवश उद्दाहक कर्म
दर्पद्रव दर्शन दर्पावलि किया दीपावलि का अपशर्म
उलूकारूढ़ माया विमूढ़ बनकर छलीं छलीं
जग मग ज्योति जलीं, धरा पर जग मग ज्योति जलीं … (7)
अन्धकारान्धकारान्त गूढ़ निपुणा बनीं धर्मयुद्ध व्यूढ़
पार्वतीपुत्र कार्तिक–गणेश मयूरारूढ़ मूषकारूढ़
आशिष लिये तब माँ उमा से योद्धा युद्ध बली
जग मग ज्योति जलीं, धरा पर जग मग ज्योति जलीं … (8)
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