– ग़ज़ल –
ज़ुल्म ढाते हैं वो आसमाँ की तरह
हम तड़पते हैं एक बेज़बाँ की तरह
किस से अब शिकवए बेवफाई करें
पेश आते हैं वो मेह्रबाँ की तरह
उनकी चश्मे करम हो गई ग़ैर पर
हम तड़पते रहे नीम जाँ की तरह
वो बबातिन तो कुछ मेह्रबाँ हैं मगर
उनकी नज़रें हैं ना मेह्रबाँ की तरह
साथ सफ़वी के मैखानए इश्क़ में
शेख भी आए पीरे मोग़ाँ की तरह
(9 जनवरी 1961)
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