ग़ज़ल

जिसे भेंट श्रद्धा सुमन कर रहा था
वही देश पूरा हवन कर रहा था

मैं जिसके लिये ला रहा था उजाला
वही घोर तम का सृजन कर रहा था

बुलाती जिसे गाँव की मुशिकलें थीं
वो दिल्ली में बैठा भजन कर रहा था

सदा डाह रखता ज़माने से जो था
ज़माना उसी को नमन कर रहा था

बदलने चला था जो बिगड़े चलन को
वही सभय़ता आचमन कर रहा था

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