ग़ज़ल

जो रोज़े-हश्र लैला परदए मोहमिल से निकले गी
यक़ीं है आरजूए-कैस उस दिन दिल से निकले गी

तमन्ना तीग़ कातिल की रगे बिस्मिल से निकले गी
तमन्नाए रगे बिस्मिल दिले कातिल से निकले गी

न देखो मुस्कुरा कर ऐ तबीबो राह लो अपनी
खलिश है उनके ग़म की ये ज़रा मुश्किल से निकले गी

अगर महफिल निकाला अह्ले महफिल ने जो ’राशिद’ का
यक़ीनन सारी रौनक़ साथ ही महफिल से निकले गी

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