झरती हुई चांदनी

झरती हुई चांदनी में

मन डूबा डूबा लगता है।

चेहरे के भीतर का चेहरा

ऊबा ऊबा सा लगता है।

खुशबू खुशबू हो जाते थे

सिर्फ करीब गुजरने से।

उस गुलशन का पत्ता पत्ता

जहर में डूबा लगता है।

अब उम्मीद नहीं लगती है

कुछ भी यहां उजाले की।

हर घर एक अंधेरी तह में

बड़ा अजूबा लगता है।

बेमानी उपदेश हो चुके

शब्द चलन के बाहर है।

जाने किस फितरत में डूबा

सूबा सूबा लगता है।।

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