गजल

तुम्हारी बज्म से कुछ बावकार हैं हम भी
कुछ बुलन्दी के हिस्सेदार हैं हम भी

न ऐब सारे कभी दूसरों में तुम देखो
इस जमाने में गुनहगार हैं हम भी

शहर की महफिलों में रोशनी है हमसे ही
और अंघेरों के जिम्मेदार हैं हम भी

कोशिशें खूब कीं उसने हमें डुबोने की
अपने दम से मगर दरिया के पार हैं हम भी

छोडकर तुझको अब जाऐं तो कहां जाऐं हम
तेरी जुल्फों में गिरफतार हैं हम भी