– गीत –
आये घन कारे परदेशी तुम कब आओगे
प्यासे मन की निर्मोही कब प्यास बुझाओगे
तुम कब आओगे —–
रस गागर छलके आँगन कानन मयूर नाचे
पल छ्नि परै न चैन रैन पपीहा पाती बाँचे
बीत गई जो ऋतु बहार की फिर पछताओगे
तुम कब आओगे —–
कब मधुर मिलन की मन में आस बसाये हैं
स्वागत में सुरभित सुमनों की सेज सजाये हैं
यौवन की पूँजी लुट जाने पर क्या पाओगे
तुम कब आओगे —–
रूपजाल में कहीं किसी के कन्त न फँस जाना
मन मन्दिर के देव मेरे मत मुझको बिसराना
भीगे नयन निहारें पथ कब तक तरसाओगे
तुम कब आओगे —–
संग संग बीते मधुरिम वे दिन याद आते हैं
स्वप्न तुम्हारे सुखद सुहाने बहुत रुलाते हैं
गाँव गाँव की माटी को कैसे बिसराओगे
तुम कब आओगे —–
आये घन कारे परदेशी तुम कब आओगे
तुम कब आओगे —–
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